देहरादून: उत्तराखंड की महिलाएं अब अपने पारंपरिक हुनर और स्थानीय संसाधनों को रोजगार और आय के साधन में बदल रही हैं। राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं के जरिए महिलाओं को स्वरोजगार, कौशल विकास, पारंपरिक हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों से जुड़े कामों के लिए प्रशिक्षण और सहायता दी जा रही है। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करना और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर बढ़ाना है।
महिलाओं को स्वरोजगार के लिए मिल रहा प्रशिक्षण
राज्य में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना, कौशल विकास कार्यक्रम, ग्राम उत्थान योजना और पीएम विश्वकर्मा योजना जैसी योजनाओं पर काम किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना और कौशल विकास कार्यक्रमों के तहत महिलाओं को उनकी रुचि और स्थानीय जरूरतों के अनुसार प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण के साथ उन्हें स्वरोजगार शुरू करने के लिए जरूरी मार्गदर्शन और सहायता भी उपलब्ध कराई जा रही है।
वहीं, ग्राम उत्थान योजना के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में तैयार होने वाले स्थानीय उत्पादों को बाजार से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। इससे गांवों में आय के नए साधन विकसित होने के साथ-साथ ग्रामीण पलायन को कम करने में भी मदद मिल सकती है।
अल्मोड़ा की भावना शर्मा ने स्थानीय उत्पादों को दिया नया रूप
अल्मोड़ा जिले के चौखुटिया क्षेत्र के पीपलधार गांव की भावना शर्मा इसका एक उदाहरण हैं। उन्होंने स्थानीय उत्पादों और पारंपरिक कला को नए रूप में पेश करने का प्रयास किया है।
भावना शर्मा पहाड़ी दालों की आकर्षक पैकेजिंग के साथ-साथ अचार, ऐपण पेंटिंग, ऐपण फ्रेम, ऐपण साड़ी और क्रोशिया से जुड़े उत्पाद तैयार कर रही हैं।
इन प्रयासों से स्थानीय महिलाओं को आय के नए अवसर मिल रहे हैं। साथ ही उत्तराखंड की पारंपरिक कला और स्थानीय उत्पादों को आधुनिक बाजार की जरूरतों के अनुरूप पेश करने में भी मदद मिल रही है।
ऐपण कला को मिल रहा आधुनिक बाजार
उत्तराखंड की प्रसिद्ध ऐपण कला अब केवल पारंपरिक सजावट तक सीमित नहीं रह गई है। इसे आधुनिक जरूरतों और बाजार की मांग के अनुसार नए उत्पादों में शामिल किया जा रहा है।
ऐपण से तैयार फ्रेम, साड़ियां और आभूषण जैसे उत्पादों को बाजार में पेश किया जा रहा है। बेहतर डिजाइन और आकर्षक पैकेजिंग के जरिए पारंपरिक कला को नए ग्राहकों तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है।
इसी तरह पहाड़ी दालों और घर में तैयार किए जाने वाले स्थानीय उत्पादों की बेहतर पैकेजिंग से उनकी बाजार क्षमता बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है।
चमोली में पीएम विश्वकर्मा योजना से पारंपरिक कारीगरों को मदद
चमोली जिले में पीएम विश्वकर्मा योजना के तहत पारंपरिक व्यवसायों से जुड़े लोगों को प्रशिक्षण देने का काम किया जा रहा है।
बढ़ई, लोहार और अन्य पारंपरिक कारीगरों को आधुनिक तकनीक, नए औजारों और उद्यमिता से जुड़ी जानकारी दी जा रही है। इसका उद्देश्य पारंपरिक हुनर को आधुनिक बाजार की जरूरतों से जोड़ना है।
इस प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि उन्हें रोजगार और स्वरोजगार के अतिरिक्त अवसर मिल सकें।
पैकेजिंग और मार्केटिंग पर भी जोर
स्थानीय उत्पादों को बाजार में बेहतर पहचान दिलाने के लिए केवल उत्पादन ही नहीं, बल्कि गुणवत्ता, पैकेजिंग और मार्केटिंग पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
महिला स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय उद्यमियों द्वारा तैयार उत्पादों को आकर्षक तरीके से बाजार तक पहुंचाने के लिए प्रशिक्षण और मार्गदर्शन दिया जा रहा है।
सरकार का प्रयास है कि उत्तराखंड की महिलाएं अपने पारंपरिक कौशल को केवल घरेलू गतिविधि तक सीमित न रखें, बल्कि उसे स्थायी आय और व्यवसाय के अवसर में बदल सकें।
गांवों की अर्थव्यवस्था को भी मिल सकती है मजबूती
स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक हुनर को बाजार से जोड़ने से इसका फायदा केवल महिलाओं तक सीमित नहीं रहेगा। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे व्यवसायों को बढ़ावा मिल सकता है और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।
उत्तराखंड की पारंपरिक कला, पहाड़ी उत्पाद और हस्तशिल्प को आधुनिक बाजार से जोड़ने की कोशिशें राज्य की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती हैं।
