उत्तराखंड मदरसों में भाईचारा और समाज सेवा: उत्तराखंड के मदरसों में अब धार्मिक शिक्षा के साथ बच्चों को भाईचारे, समाज सेवा और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ने पर भी जोर दिया जा रहा है। इसके लिए धार्मिक शिक्षा के पाठ्यक्रम में भाईचारे और समाज सेवा से जुड़े नए अध्याय शामिल किए गए हैं। साथ ही ईद, बकरीद और मुहर्रम जैसे आयोजनों में हिंदू-मुस्लिम समेत सभी वर्गों के लोगों को शामिल करने की योजना है।
इस पहल का उद्देश्य बच्चों को पढ़ाई के साथ सामाजिक जिम्मेदारियों से जोड़ना और समाज में आपसी भाईचारे का संदेश देना बताया गया है।
बच्चों को सिखाया जाएगा समाज के लिए अच्छा काम करना
नई व्यवस्था के तहत मदरसों में बच्चों को केवल धार्मिक विषयों की जानकारी देने के बजाय समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारी समझाने पर भी ध्यान दिया जाएगा। बच्चों को भाईचारे, सेवा और अच्छे कार्यों के महत्व के बारे में बताया जाएगा।
इसके लिए ‘शुक्र की डायरी’ शुरू करने की बात कही गई है। इसमें बच्चे अपने अच्छे कामों को दर्ज करेंगे। वे लिखेंगे कि उन्होंने किसी की मदद कैसे की, कौन सा नेक काम किया और समाज के लिए उन्होंने क्या सकारात्मक काम किया।
इस तरह बच्चों को रोजमर्रा की जिंदगी में अच्छे कार्य करने और उनकी अहमियत समझने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
ईद और मुहर्रम के आयोजनों में सभी वर्गों को बुलाने की तैयारी
मदरसों में होने वाले ईद, बकरीद और मुहर्रम से जुड़े आयोजनों में सभी वर्गों के लोगों को शामिल करने पर भी जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य धार्मिक आयोजनों के माध्यम से आपसी मेलजोल और भाईचारे को बढ़ावा देना है।
प्राधिकरण की ओर से इसे समाज में सकारात्मक संदेश देने की दिशा में एक प्रयास बताया गया है। इसके जरिए बच्चों को भी अलग-अलग समुदायों के साथ मिलकर रहने और सामाजिक संबंधों को मजबूत करने की सीख देने की कोशिश की जाएगी।
उर्दू के साथ हिंदी में भी होंगी वाद-विवाद प्रतियोगिताएं
मदरसों में अब उर्दू के साथ हिंदी भाषा में भी वाद-विवाद प्रतियोगिताएं आयोजित करने की बात कही गई है। इसका उद्देश्य बच्चों में अपनी बात रखने के साथ-साथ दूसरों के विचारों को सुनने और समझने की क्षमता विकसित करना है।
वाद-विवाद जैसी गतिविधियों से बच्चों को अलग-अलग विषयों पर सोचने और अपनी बात प्रभावी तरीके से रखने का अवसर मिलेगा। इससे उनकी संवाद क्षमता को भी बेहतर बनाने पर जोर रहेगा।
प्रदेश में 452 मदरसों को मिली थी मान्यता
जानकारी के मुताबिक, प्रदेश में 452 मदरसे मदरसा बोर्ड से मान्यता प्राप्त थे। 30 जून को मदरसा बोर्ड भंग होने के बाद अब इन मदरसों को अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के तहत संचालित किया जाना है।
हालांकि, बोर्ड भंग होने के करीब डेढ़ महीने बाद तक मान्यता के लिए केवल 60 मदरसों की ओर से आवेदन किए गए हैं।
मान्यता नहीं लेने वाले मदरसों पर शासन को रिपोर्ट
अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अध्यक्ष डॉ. सुरजीत सिंह गांधी के अनुसार, मदरसा संचालकों को मान्यता लेने के लिए कहा जा रहा है। उन्होंने कहा कि जो संचालक मान्यता के लिए तैयार नहीं हैं और बिना मान्यता के बच्चों को दाखिला देकर मदरसे संचालित कर रहे हैं, उनके संबंध में शासन को रिपोर्ट भेजी जा रही है।
उन्होंने बताया कि इस संबंध में रिपोर्ट सोमवार तक भेजे जाने की बात कही गई है।
आधुनिक शिक्षा और संस्कार पर भी जोर
अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अनुसार, मदरसों के पाठ्यक्रम को आधुनिक शिक्षा, व्यवहारिकता और भाईचारे को ध्यान में रखते हुए तैयार करने पर जोर दिया जा रहा है।
प्राधिकरण का कहना है कि बच्चों के लिए केवल तालीम ही पर्याप्त नहीं है। उनके अंदर अच्छे संस्कार, सामाजिक जिम्मेदारी और दूसरों के प्रति सम्मान की भावना विकसित करना भी जरूरी है।
इस पहल के तहत शिक्षा के साथ बच्चों के व्यवहार और सामाजिक सोच पर भी ध्यान देने की कोशिश की जा रही है, ताकि मदरसों से निकलने वाले बच्चे आगे चलकर समाज के लिए सकारात्मक योगदान दे सकें।
